Saturday, December 22, 2018


एक शाम 


बेरोज़गारी के उन तन्हा लम्हों को 
सब्ज़ करता है तेरा तस्सवुरऱ 

नूर-ए-सादगी तेरी आँखों का   
ही तो है मेरा हौसला-ए-कलम 

लबों से लफ्ज़ जो निकले 
लब फैले कभी सिकुड़े 
हसी जो चेहरे पर बिखरे 
दीदार-ए-मंजर तो महफ़िल हो जाए 

सीने में बैठा वो शायर बग़ावत करदे 
ये खूबसूरत ख्याल हमें काफिर करदे 
इससे पहले 

खोल लेते हैं थम से अपनी आँखें 

Friday, March 2, 2018

We all are Hacked...


HACKED


One day when I woke up
a thought crossed my mind
what if somebody hacked me
I saw someone was in there my phone
troubling my little mind 
with lots and lots of suggestions
tracking all my locations
saving all of my credentials

One day when I woke up
a thought crossed my mind
what if someone is watching me
all the time
all my tired days and lazy nights
listening to my devilish laughs and deep cries
capturing my moods
the lows and the highs

what if somebody knows me
better than mine
tracking my searches from five to nine
selling me all the shit
I don't wanna buy
makes me a bloody better consumer
at every try
don't even know whether I am a consumer
or it is consuming all my time
lots and lots of information
boggling our little minds

One day when I woke up
I saw my digital self
lying on a computer chip
in those big data centers of this giant
not just our phones
somebody hacked into our lives

Friday, September 29, 2017

Nothing of me is mine.

                                

                           I Owe You


आओ और न सोचो, सोच के क्या पाओगे 
जितना भी समझे हो, उतना पछताए हो 
                                                        जावेद अख़्तर     

आओ और न सोचो, सोच कर क्या पाओगे 
जितना भी समझे हो, उतना पछताए हो 
अब इतनी समझ लेकर तुम कहाँ जाओगे 
जितना भी समझोगे, उतना ही उलझोगे 

गनीमत है, तुम खुद को सुलझा पाओगे 
आदम के अख्लाकी कारागारों में 
कायदों में किरदारों में 
खुद को  ढल्ता पाओगे 

आओ और न सोचो 
ज्यादा गर तुम सोचोगे    
तो उधार की सोच से 
वक़्त की नींव पर बनी 
ये समझ की इमारत ढह जाएगी 

आज़ादी तो ले जाओगे 
मगर वीरानों में खो जाओगे 
वो समझ वापस न बुन पाओगे 
वक़्त से मत खाओगे 
यार बड़े पछताओगे 

समझ में सब आएगा 
समझ न कभी कुछ पाओगे 
चोट तो तुम खाओगे 
महसूस न कभी कर पाओगे 
सही और गलत ही भूल जाओगे 


Friday, May 12, 2017

For the professor.

                         

               NIGHTingale .2


काश के होती इस चेहरे पर गुस्से की वो शिकनें 
बस कुछ ही पलों के लिए 
तो शायद ख़ुद को तुजसे नाराज़ पाता मैं 
यूँ खुली आँखों से न
तेरे तस्सवुर के जाम पाता मैं 

काश के होती उस आवाज़ में ज़रा सी कड़वाहट 
तो यूँ न तुझे सुनने के लिए                                         
ज़ेहन में झूठे सवाल बुन पाता मैं 

ऐ काश न होता तुझमें वो अदब                 
तो न होता मैं भी इतना बेअदब    
फ़िर अपनी कलम की इन गुस्ताखियों  में 
न तुझे तू बुलाता मैं                                                         

काश के होती मुझमे वो समझ 
की तुझे                                                   
इस लिबास, शक्ल और स्वभाव के 
पार देख पाता मैं 
गर न होता ये पाक रिश्ता दरमियाँ
तो किसी दिन बिना गुनाह की खलन के 
तुझसे नज़रें मिलाता मैं

Friday, March 24, 2017

Woods of thoughts

                     उम्मीद

बेरोज़गारी के उस लम्हे में
जो ख़याली बीज बोया था मैंने
वो ऐसे फैला
की आज वहां एक जंगल हो गया है
आरजू का ये मुसाफ़िर
ख़ुद ही उसमे खो गया है
आफ़ताब गरूब होने को है
मगर कोई पगडण्डी नहीं दिखती

अँधेरा जो आया है
अपने साथ कई फरीब-ए-नज़र लाया है
पेड़ों की टहनियां भी अब तो
सांप नज़र आती हैं

जिस्म कट रहा है काँटों से
लहू के कुछ ही क़तरे बाक़ी हैं
कि अचानक इक रौशनी दिखी है
इतनी छोटी है
बोहोत दूर मालूम होती है

शक है उसे
क्या ये चंद लहू के क़तरे
ले जाएंगे उसे वहां तक

मुसाफ़िर टूट कर गिर गया है
ख़ुदा से जन्नत की भीक़ मांगने लगा है
अचानक वो रौशनी उसके पास आई

अब मालूम होता है
जुगनू-ए-उम्मीद से निकल रही थी वो
जुगनू को राह मालूम थी
मगर वो भी मर रहा था
इस वीरान जंगल में बेसहारा

उसे आस थी
मुसाफ़िर के हत्थे चढ़कर वो भी
जंगल पार कर लेगा
मगर अब वो भी मौत के आहोश में है

ऐ काश
मुसाफ़िर को जुगनू-ए-उम्मीद का इल्म होता


Monday, March 20, 2017

Dysphoria

                       नब्ज़


ज़िन्दगी थम सी गई है
कि मौत भी अब तो
एक हलचल सी लगती है
छोटी सी हलचल

यूँ लगता है मेरा हर ख्वाब
बिजली की तार सा है
जिसमें ज़िन्दगी भरी हो
रफ़्तार भरी हो
वो बदलाव भरा हो
जिसकी तलाश है मुझे

मगर ये समझ
रोकती है मुझे वो तार छूने से
इसे लगता है ये मौत है
मगर दिन और रात का चक्कर लगाता
ये मुज्जसिमा ज़िंदा कहाँ है

नब्ज थम गई है इसकी
दिल बेचैन है उस बिजली के लिए
उस हलचल के लिए
जब हर लम्हा एहसास मेरे
इक बदलाव का जाम पियें

इक आस है
शायद मेरी नब्ज फिर से चल पड़े

Wednesday, February 8, 2017

For Human Perception

A Vulnerable Mind


When I rewind back in time
I usually find a vulnerable mind
nurtured by the environment
tortured by the environment
the spectacles I wear of perception
sometimes leads to dangerous deceptions
realizing the fake
faking the reality

when I rewind back in time
I usually find a vulnerable mind
I see what I want to
I feel what I want to
do I really want to

I find myself bind by chains
chains of experiences
chains of feelings
chains originated from a chain of events
chains following a fixed pattern
I try to break the chains
the more I strike,more I stuck

when I rewind back in time
I usually find
I am not I
you are not you
then who the fuck
 are we pretending to?

sometimes I laugh at you
your fixed reactions to actions
but soon I realize
I am one of you
en lighting the patterns
by following them

here exists the irony....